25 से उम्मीदें _ विजय गर्ग

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वर्ष 2025 से उम्मीदें
विजय गर्ग
इस समय अधिकांश लोग सोच रहे हैं कि आगामी वर्ष 2025 कैसा होगा ? ये अनुमान मिश्रित प्रकृति के हैं। प्रख्यात फ्रांसीसी संत और ज्योतिषी नास्टरडैमस ने 2025 में भारत और दुनिया के भविष्य के बारे में अनेक महत्वपूर्ण अनुमान लगाए थे। सोलहवीं शताब्दी के इस संत ने अनेक ऐसी घटनाओं का अनुमान लगाया था जिन्होंने दुनिया को स्वरूप दिया है। इनमें कोविड-19 वैश्विक महामारी से लेकर मनुष्य के चंद्रमा पर उतरने जैसी बातें शामिल हैं। इनसे नास्टरडैमस के अनुमानों पर आश्चर्य होता है। आज अनेक लोग सोलहवीं शताब्दी के इस संत की भविष्यवाणियों की व्याख्या कर रहे हैं और उनकी ऐतिहासिक सटीकता से प्रभावित हैं।
नास्टरडैमस ने अनुमान लगाया था कि रूस यूक्रेन युद्ध 2025 में समाप्त हो सकता है। उन्होंने चेतावनी दी थी कि दोनों देश जलवायु संकट और बाढ़ का सामना कर सकते हैं। ‘द न्यूयार्क पोस्ट’ अनुसार, तुर्किये और फ्रांस यूक्रेन और रूस के बीच शांति प्रक्रिया में काफी सहायता दे सकते हैं। नास्टरडैमस ने 2025 में इंग्लैंड में ‘प्राचीन प्लेग’ का पूर्वानुमान किया था जिससे एक ऐतिहासिक बीमारी के पुनः उभरने की आशंका पैदा होती है। इसके साथ ही उन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध में ब्राजील की संलिप्तता तथा अनेक प्राकृतिक विभीषिकाओं का भी पूर्वानुमान लगाया है। इनके साथ ही नास्टरडैमस ने अनुमान लगाया है कि धरती की एक छुद्र ग्रह या एस्टीरॉयड से टक्कर हो सकती है। उन्होंने कहा था, ‘ब्रह्मांड से आग का एक गोला उठेगा जो भविष्य बदलने वाला होगा।’ नास्टरडैमस की भविष्यवाणियां हमें संभावित भावी घटनाओं तथा उनके प्रभावों के बारे में सचेत करती हैं।
जहां तक भारत के भविष्य का सवाल है, वर्ष 2025 की शुरुआत गणतंत्र दिवस परेड से होगी। इस बार परेड की थीम ‘स्वर्णिम भारत: विकसित भारत’ है, हालांकि अभी परेड में आमंत्रित मुख्य अतिथि के नाम को अंतिम रूप नहीं दिया गया है। धार्मिक दृष्टिकोण से देखें तो उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में अगला महाकुंभ 13 जनवरी, 2025 से 26 फरवरी, 2025 तक होगा महाकुंभ के अवसर पर हर 12 साल के अंतराल पर अलग-अलग स्थानों पर यह महान आध्यात्मिक आयोजन होता है। इस अवसर पर लाखों-लाख तीर्थयात्री और श्रृद्धालु गंगा, यमुना और सरस्वती पवित्र संगम पर स्नान करने के लिए एकत्र होते हैं। केन्द्र तथा राज्य सरकार महाकुंभ के इस आयोजन को असाधारण और अभूतपूर्व बनाने के सभी प्रयास कर रही हैं। अगले वर्ष 2025 में भारत में तेज आर्थिक प्रगति, सामाजिक परिवर्तन तथा नई नई तकनीकें देखने को मिल सकती हैं। सरकार तकनीकी शिक्षा तथा नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में तेजी से सुधार कर रही है।
इन प्रयासों से आर्थिक प्रगति तेज होने की आशा है जो भारत में भावी समृद्धि के लिए शुभ संकेत है। विश्व स्तर पर भारत का महत्व इस वर्ष और बढ़ने की आशा है जिससे वह अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ व्यापार, रक्षा और जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में अपने प्रयास तेज करेगा। इनसे भारत की दुनिया भर में बढ़ती राजनीतिक शक्ति का भी पता चलता है। देश के स्तर पर विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना कर रहा है और इसकी एकजुटता पर सवाल उठने लगे हैं। इस विपक्षी गठबंधन के भीतर पहले ही काफी तनाव पैदा हो गए हैं। तृणमूल कांग्रेस-टीएमसी तथा आम आदमी पार्टी आप ने गठबंधन से दूरी बना ली है। ‘आप’ ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में अकेले उतरने का मन बना लिया है। विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ में हालिया हरियाणा, महाराष्ट्र व झारखंड विधानसभा चुनावों के समय दरारें दिखने लगी थीं। जहां कांग्रेस ने हरियाणा और महाराष्ट्र में खराब प्रदर्शन किया, वहीं झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा- जेएमएम के साथ उसके गठबंधन ने चुनाव में विजय प्राप्त की। ‘इंडिया’ गठबंधन के सदस्य कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन से दुःखी हैं। उनकी नजर अब इस बात पर लगी है कि 2025 में होने वाले दिल्ली व बिहार विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन कैसा रहता है। आगामी विधानसभा चुनावों से भावी राजनीतिक पुनः ध्रुवीकरण के भी संकेत मिलेंगे दिल्ली में विधानसभा चुनाव फरवरी में होंगे जहां भाजपा आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल को सत्ता से हटाने के लिए कमर कस रही है। ‘आप’ ने निकट अतीत में अनेक चुनौतियों का सामना किया है जिसमें उसके अनेक नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप शामिल हैं। एक रणनीति के रूप में ‘आप’ ने आतिशी को चुनावों तक दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाया है। हालांकि, आप और कांग्रेस ने दिल्ली में लोकसभा चुनाव एकसाथ लड़ा था। इसमें आप का प्रदर्शन थोड़ा बेहतर था, पर कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली थी। अगले वर्ष बिहार विधानसभा के चुनाव भी होंगे। यह राजनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण राज्य है। यहां सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन- राजग का नेतृत्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कर रहे हैं, पर उनको ‘महागठबंधन’ से कठोर चुनौती का सामना करना पड़ रहा है जिसका नेतृत्व राष्ट्रीय जनता दल राजद नेता तेजस्वी यादव कर रहे हैं। भाजपा और जनता दल युनाईटेड – जदयू राज्य में पुनः अपनी सरकार बनाने के लिए प्रयासरत हैं। वर्ष 2025 में दो महत्वपूर्ण राजनीतिक संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सीपीआई व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस अपनी शताब्दी मनाएंगे। आरएसएस अपनी स्थापना के 100 वर्ष सितंबर में पूरे करेगा, जबकि सीपीआई इस वर्ष दिसंबर में अपने शताब्दी समारोहों की शुरुआत करेगी। अनेक उतार-चढ़ावों के बावजूद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस ने भारतीय राजनीति और समाज को गहराई तक प्रभावित किया है। ऐसे में किसी सरकार के लिए अब भविष्य में उसे कमजोर करना बहुत कठिन हो गया है। इसके साथ ही दक्षिणपंथी दलों के ज्यादा लोकप्रिय होने के कारण कम्युनिस्ट पार्टियों का प्रभाव कम हो गया है।
अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर गौर करें तो भारत 2025 में क्वाड सम्मेलन आयोजित करेगा। मूलतः इसका आयोजन इस सितंबर में नई दिल्ली में होना था, पर इसमें भाग लेने वाले नेताओं के अन्य कार्यक्रमों के कारण इसका आयोजन न्यूयार्क में हुआ अब भारत 2025 में क्वाड शिखर सम्मेलन आयोजित करेगा। इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दिल्ली आने की आशा है। जिससे अंतरराष्ट्रीय मामलों में भारत की स्थिति और मजबूत होगी। अगले वर्ष के प्रारंभ में रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन की भारत यात्रा प्रस्तावित है जो एक महत्वपूर्ण अवसर होगा। क्रेमलिन ने अगले वर्ष के प्रारंभ में इसकी तारीख तय करने की पुष्टि की है। यह यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पुतिन की पहली यात्रा होगी। कुल मिला कर वर्ष 2025 भारत के लिए उम्मीदों से भरा है।
अर्थव्यवस्था की अच्छी प्रगति हो रही है तथा विदेशी संबंध स्थिर हैं, हालांकि अभी राजनीतिक स्थिति अस्पष्ट है। अगले वर्ष देखना होगा कि कांग्रेस की स्थिति में कुछ सुधार होता है अथवा भाजपा व अन्य क्षेत्रीय पार्टियां मतदाताओं पर अपनी पकड़ और मजबूत करने में सफल होती हैं।
विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल शैक्षिक स्तंभकार स्ट्रीट कौर चंद एमएचआर मलोट पंजाब
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खाद्य सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन से निपटने की कुंजी
विजय गर्ग
जलवायु-स्मार्ट कृषि एक परिवर्तनकारी समाधान के रूप में उभरती है, जो उत्सर्जन को कम करने और खाद्य प्रणालियों को सुरक्षित करने की रणनीतियों के साथ स्थायी प्रथाओं का संयोजन करती है। आहार में बदलाव और बढ़ती वैश्विक आबादी के कारण भोजन की मांग लगातार बढ़ रही है। वर्तमान में, लगभग 690 मिलियन लोग – या दुनिया की 8.9 प्रतिशत आबादी – भूख से पीड़ित हैं। 2050 तक, दुनिया को अनुमानित 9 अरब लोगों के भरण-पोषण के लिए लगभग 70 प्रतिशत अधिक भोजन का उत्पादन करने की आवश्यकता होगी, जो खाद्य सुरक्षा को एक गंभीर चुनौती बनाता है। जलवायु परिवर्तन इस समस्या को और बढ़ा देता है, जिससे खाद्य उत्पादन का पर्यावरणीय प्रभाव और भी तीव्र हो जाता है। कृषि, आवश्यक होते हुए भी, जलवायु संकट में एक प्रमुख योगदानकर्ता है, जो वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का 19 प्रतिशत से 29 प्रतिशत के बीच उत्पन्न करती है। वैश्विक स्तर पर प्राकृतिक आपदाओं से आर्थिक नुकसान भी बढ़ रहा है और कृषि क्षेत्र विशेष रूप से असुरक्षित है। आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (यूएनआईएसडीआर) के अनुसार, आपदा प्रभावित देशों को 1998 और 2017 के बीच 2,908 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान हुआ, जिसमें से 77 प्रतिशत नुकसान जलवायु संबंधी आपदाओं के कारण हुआ। हाल के वर्षों में, कृषि पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अधिक स्पष्ट हो गया है। उदाहरण के लिए, भारत में जलवायु परिवर्तन के कारण 2010 और 2039 के बीच देश भर में प्रमुख फसल की पैदावार में 9 प्रतिशत तक की कमी का अनुभव होने का अनुमान है। क्षेत्रीय प्रभाव और भी गंभीर हो सकते हैं, चावल के लिए 35 प्रतिशत, गेहूं के लिए 20 प्रतिशत, ज्वार के लिए 50 प्रतिशत, जौ के लिए 13 प्रतिशत और मक्के के लिए 60 प्रतिशत तक की संभावित हानि हो सकती है। जलवायु परिवर्तन खाद्य उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है जबकि पहले से ही नाजुक पारिस्थितिक तंत्र के क्षरण में तेजी लाता है। इन चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए, क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर (सीएसए) प्रथाओं को अपनाना जरूरी है, जिसका उद्देश्य उत्पादकता और आय में लगातार वृद्धि करते हुए कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों को कम करना है। सीएसए स्थायी कृषि प्रथाओं और ग्रामीण विकास लक्ष्यों को एकीकृत करता है, जो बेहतर पर्यावरण प्रबंधन और भूख में कमी जैसे व्यापक उद्देश्यों में योगदान देता है, जैसा कि सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों (एमडीजी) में उल्लिखित है। भारत में जलवायु-स्मार्ट कृषि पद्धतियाँ: कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से निपटने के लिए भारत सक्रिय रूप से जलवायु-स्मार्ट कृषि (सीएसए) प्रथाओं को अपना रहा है। इनमें पैदावार बढ़ाने और उत्सर्जन को कम करने के लिए जीरो-टिलेज जैसी संरक्षण कृषि तकनीकें, जैव विविधता और लचीलेपन को बढ़ाने के लिए कृषि वानिकी, और संसाधनों को अनुकूलित करने के लिए जीपीएस और जीआईएस जैसी सटीक कृषि तकनीकें शामिल हैं। ड्रिप सिंचाई जैसी जल प्रबंधन रणनीतियाँ दक्षता में सुधार करती हैं, जबकि कुशल पशुधन प्रबंधन राजस्व और उत्पाद की गुणवत्ता को बढ़ाता है। सिंचाई के लिए सौर ऊर्जा का तेजी से उपयोग किया जा रहा है, जिससे जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम हो गई है। फसल विविधीकरण, फलियों के साथ चक्रीकरण और जलवायु-लचीली किस्मों की खेती जैसी प्रथाएं स्थिरता को बढ़ाती हैं, जबकि एकीकृत कीट प्रबंधन और फसल अवशेष प्रबंधन रासायनिक उपयोग और प्रदूषण को कम करते हैं, जिससे दीर्घकालिक कृषि और पर्यावरणीय स्वास्थ्य सुनिश्चित होता है। भारत में जलवायु-स्मार्ट कृषि के समक्ष चुनौतियाँ: इसके असंख्य लाभों के बावजूद, भारत में सीएसए प्रथाओं को अपनाने में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जलवायु परिवर्तनशीलता: बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा और घटते जल संसाधनों से फसल उत्पादकता 10-40 तक कम होने का खतरा है।सदी के अंत तक प्रतिशत. समुद्र के बढ़ते स्तर, चक्रवात और तूफ़ान से कृषि भूमि खतरे में पड़ जाती है, खासकर सुंदरबन, केरल और तमिलनाडु जैसे क्षेत्रों में। उच्च लागत: सीएसए विधियों को लागू करने में अक्सर महत्वपूर्ण वित्तीय निवेश शामिल होता है, जो किसानों को रोक सकता है। नीति और नियामक बाधाएं: अपर्याप्त नीतियां और प्रतिबंधात्मक नियम व्यापक सीएसए अपनाने में बाधा डालते हैं। जलवायु-स्मार्ट कृषि को अपनाना अब वैकल्पिक नहीं बल्कि एक तत्काल आवश्यकता है।
विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल शैक्षिक स्तंभकार स्ट्रीट कौर चंद एमएचआर मलोट पंजाब
(3: )लोक से विमुख लोग
विजय गर्ग
हमारा भारतीय समाज लोकानुरागी रहा है। लोक उसकी आत्मा का हिस्सा रहा । लोक के आलोक में ही उसका जीवन दीप्त होता था। लेकिन धीरे- धीरे शहरीकरण ने लोक को हाशिये पर धकेल दिया है। इसका दुष्परिणाम समाज भोग रहा है। हम सब जानते हैं कि लोक का भोजन अमृत रहा है, क्योंकि उसमें शुद्धता की गारंटी हुआ करती थी । आज भी बहुत ह तक वहां शुद्धता बची हुई है। जबकि अनुभव यही बताता है कि शहरी भोजन अब जहर बनता जा रहा। सांसों में घुलता विषैला धुआं और खानपान में मिलावट शहरी जीवन का दुष्परिणाम हो गया है। लोक में रहने वाला समाज सहज रूप से शुद्ध प्रकृति के साथ रहता है ।
चतुर्दिक पसरी हरियाली और नदी – तालाब की समृद्धि, तन-मन दोनों को स्वस्थ बनाए रखती । इधर कभी प्रकृति के संग रहने वाला नागर समाज अब धीरे-धीरे प्रकृति का दुश्मन होता जा रहा है। जबकि सभी जीव प्रकृति के साथ मजे से रहते हैं । तथाकथित विकास के नाम पर मनुष्य पेड़ काट रहा है । वह एक तरह से ‘कालिदास’ बना हुआ है। जिस डाल पर बैठा है, उसे ही काटे जा रहा। लोग नदी को प्रणाम तो करते हैं, पर तुरंत प्रदूषित भी करने लगते हैं। कुछ तो इतने चेतना – शून्य हो जाते हैं कि उनके कारखाने का दूषित जल सीधे जीवनदायिनी नदी समाता रहता है। तंत्र भी इसकी अनदेखी करता है। मनुष्य सुंदर विशाल पहाड़ों को खोद रहा है। उसके दुष्परिणाम भी भोग रहा । फिर भी वह सबक ग्रहण नहीं करता। पहले कहावत थी कि जब गीदड़ की मौत आती है तो वह शहर की ओर भागता है । अब गीदड़ की जगह मनुष्य शब्द का प्रयोग करना चाहिए। धीरे-धीरे अपने ही गांव से मनुष्य का मोह भंग हो रहा है। गांव में गाय पालने वाला व्यक्ति शहर आकर कुत्ते पालने लगता है । यह अजीब सा बदलाव है । गांव का आदमी शहर की ओर भाग रहा है और यहां कुचल कर मर रहा है, बीमार पड़ रहा है। गांव में रहते हुए जिस व्यक्ति के फेफड़े दुरुस्त थे, शहर में आकर वही फेफड़ा प्रदूषण का केंद्र बन गया है। पूरा शरीर बीमारियों का घर बनता जा रहा है।
गनीमत है कि अभी भी गांव की बची-खुची आबादी शहरी व्यामोह में नहीं फंसी । आज भी सुदूर गांवों या वनप्रांतर में कुछ ऐसे लोग या समूह निवास कर रहे हैं, शहरी जीवन से कोई संपर्क ही नहीं रखना चाहते। वे सब अपनी दुनिया में मगन हैं, यानी प्रकृति के साथ जुड़े हुए हैं। जैसे गांव से गंवईपन गायब होता जा रहा है, उसी तरह साहित्य से भी लोक-विमर्श धीरे-धीरे गायब होता जा रहा है । उसकी जगह महानगरीय जीवन और उसके संक्रमण केंद्र में आते जा रहे हैं । कहानी, कविताओं में, उपन्यासों में गांव की सोंधी खुशबू गायब है। अब जो नया साहित्य रचा जा रहा है, उसमें नग्नता की खुली वकालत है। नैतिकता अब चलन से बाहर मान ली गई है और आधुनिक होने की परिभाषा अलग मान ली गई है, जिसमें नैतिकता की जगह नहीं है। यह अजीब किस्म की उलटबांसी है । कुछ लोगों को लगता है कि यह देश 1947 में अस्तित्व में आया । उसका हजारों साल पुरानी परंपराओं से कोई वास्ता नहीं ।
जैसे-जैसे हम लोक विमर्श या लोक जीवन से दूर होते जा रहे हैं, लोक ही क्या, अपने अतीत से ही हमारा विश्वास उठता जा रहा है। समाज में आत्महीनता या पतन आ रहा है और यह साहित्य में भी स्वाभाविक रूप से आ रहा है । हम प्रेमचंद की कहानियां पढ़ते हैं, तो उसमें लोक-विमर्श दिखाई देता है। परंपरा के प्रति लगाव भी नजर आता है । उनकी पूर्व संस्कार’ जैसी कहानी की कहीं चर्चा नहीं होती। वेद व्यास जी का लोकप्रिय कथन है, ‘प्रत्यक्षदर्शी लोकानाम सर्वदर्शी भवेन्नरः ‘ । लोक जीवन को प्रत्यक्ष रूप से देखे बगैर हम मानव जीवन को ठीक से नहीं समझ सकते । इसलिए हमारे विमर्श के केंद्र में लोक- दर्शन होना चाहिए । लेकिन भारतीय समाज धीरे-धीरे इतना आधुनिक होता जा रहा है कि उसे लोक की बात करना पिछड़ापन लगने लगा है। लोक-संस्कृति, लोक-कला, लोक वाद्य, लोक की वेशभूषा, लोक – पर्व, लोक के उत्पाद – इन सबसे जैसे मोह भंग होता गया है। अब तथाकथित ‘ब्रांडेड’ वस्तुओं की ओर भागने का दौर है। बोतलबंद पानी पी सकते हैं, लेकिन तांबे या मिट्टी के घड़े में रखा हुआ पानी पीने से परहेज किया जाता है । धोती-कुर्ते वाला व्यक्ति हमें दूसरे लोक से आया हुआ प्राणी लगता है। साड़ी में लिपटी हुई स्त्री हमें पिछड़ी हुई प्रतीत होती है। गाय-भैंस को उपेक्षित करने वाला व्यक्ति जब विदेशी नस्ल का कोई कुत्ता पालता है, तो उसे लोग ‘एनिमल लवर’ या ‘पशु-प्रेमी’ कहने लगते हैं । यह तथाकथित परिवर्तन उत्थान है या सामाजिक पराभव, इस पर अब बात करना बेमानी है। लोग अपनी सुंदर परंपराओं, संस्कृतियों और कुछ बेहतर शाश्वत मूल्यों से दूर होते चले जा रहे हैं। ऐसा लगता है, यह लोक विमुखता अब बढ़ती ही जाएगी।
विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल शैक्षिक स्तंभकार स्ट्रीट कौर चंद एमएचआर मलोट पंजाब
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कीटनाशकों से विषाक्त होती मिट्टी
विजय गर्ग
समय आ गया है कि पंजाब अपने कृषि क्षेत्र के कटु यथार्थ का सामना करे जो एक भयानक विभीषिका बन गया है। भटिंडा, मानसा और लुधियाना जिलों में खेतों की मिट्टी के 60 प्रतितशत नमूनों में जहरीले कीटनाशकों के अंश बड़ी मात्रा में पाए गए हैं। इनमें घातक रसायन इंडोसल्फान व कार्बोफ्यूरान शामिल हैं और इनका स्तर किसी प्रकार सुरक्षित नहीं कहा जा सकता है। यह केवल चेतावनी न होकर पूरी तरह से सामने आया गंभीर संकट तथा टिक-टिक करता टाइम बम है।
कीटनाशकों और उर्वरकों के इस गैरजिम्मेदार प्रयोग से पंजाब के खेत बंजर हो रहे हैं। 5 दिसंबर को ‘विश्व मृदा दिवस’ पर हमें तेजी से विघटित होती कृषि व्यवस्था का सामना करना पड़ रहा है, जबकि दुनिया ‘मृदा की देखभाल: उपाय, निगरानी एवं प्रबंधन’ की बात कर रही है। ऐसे में पंजाब में पागलपन खतरनाक स्तर तक पहुंच रहा है। एक समय उर्वर भूमि तेजी से बंजर जमीन में बदल रही है और यह केवल शुरुआत है। जहरीले रसायन केवल मृदा में ही नहीं रहते हैं, बल्कि वे हमारी खाद्य श्रृंखला में शामिल हो जाते हैं तथा खाने के हर कौर के साथ धीरे-धीरे हमारे भीतर जहर भरते हैं। यह प्रक्रिया यहीं नहीं थमती है, बल्कि जहरीले रसायनों के अवशेष हमारे डीएनए में प्रवेश कर जाते हैं और इस प्रकार हमारे बच्चों तथा उनके भी बच्चों के लिए जेनेटिक परिवर्तन की जहरीली श्रृंखला पीछे छोड़ते हैं। ऐसे में हम ऐसे भविष्य का सामना कर रहे हैं जहां स्वास्थ्य पर खतरों और जेनेटिक विघटन की आशंका मौजूद है।
यह भयानक विभीषिका अनेक पीढ़ियों तक जा सकती है। हम न केवल वर्तमान पीढ़ी का स्वास्थ्य नष्ट कर रहे हैं, बल्कि हम अपने बच्चों को भी अपनी मूर्खता और लालच के कारण बरबादी की ओर धकेल रहे हैं। भावी पीढ़ियों का भविष्य ही संकट में पड़ गया है और हमारी निष्क्रियता के हर क्षण के साथ अपरिवर्तनीय जेनेटिक परिवर्तनों का खतरा मंडरा रहा है। समय आ गया है कि हम जागें, यथार्थ से मुंह चुराना बंद करें तथा संकट का सीधे-सीधे सामना करें। ऐसा न होने पर भावी पीढ़ियों का जीवन भी संकट में पड़ जाएगा। भारत ने कीटनाशकों पर नियामक ढांचे की स्थापना 1968 में की थी. पर यह दयनीय रूप से पुरानी पड़ गई है और आधुनिक चुनौतियों का सामना करने में पूर्णतः विफल है जिससे कृषि रसायनों के खतरनाक दुरुपयोग का खतरा बढ़ता जा रहा है। हालांकि, इस ढांचे में संशोधन के प्रयास 2008 से जारी हैं, पर किसानों, उपभोक्ताओं और पर्यावरण की सुरक्षा में काफी कमियां हैं। 1968 के कीटनाशक कानून तथा 1971 के कीटनाशक नियमों में समग्र परिवर्तनों की आवश्यकता है ताकि वे कीटनाशकों के दुरुपयोग से पैदा बहुआयामी संकटों का सामना कर सकें।
कीटनाशक प्रबंधन विधेयक, 2020 पीएनबी को पुराने पड़ चुके कानूनों का स्थान लेने के लिए लाया गया था, पर इसमें महत्वपूर्ण सरोकारों को संबोधित किया जाना चाहिए। इस विधेयक में कीटनाशक पंजीकरण व लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं को रेखांकित किया गया है, पर इसमें इनके खतरनाक प्रभाव से किसानों को भी समुचित सुरक्षा दी जानी चाहिए। ‘पेस्टीसाइड एक्शन नेटवर्क’ पैन इंटरनेशनल के आंकड़ों से निराशाजनक तस्वीर सामने आती है।
दुनिया भर में कीटनाशक विषाक्तता की दुर्घटनाओं से हर साल लगभग 11,000 लोगों की मौत होती है जिसमें अकेले भारत में खतरनाक रूप से 6,000 लोग हताहत होते हैं। इन आंकड़ों से स्वाभाविक रूप से कीटनाशक प्रयोग व्यवहारों और सुरक्षा उपायों में व्यापक कमियां उजागर होती हैं। अक्सर किसानों तथा ग्रामीण समाज को रसायनों के प्रयोग का खामियाजा भुगतना पड़ता है। यह खासकर गहन कृषि वाले क्षेत्रों, जैसे पंजाब में बहुत गंभीर है। धान और गेंहूं की खेती में कीटनाशक प्रयोग की दर खतरनाक रूप से बहुत ऊंची है। इसमें औसतन 77 किलो प्रति हेक्टर कीटनाशक प्रयोग होता है, जबकि राष्ट्रीय औसत 62 किलो प्रति हेक्टर है। कीटनाशक उपभोग में भारत में उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के बाद पंजाब का तीसरा स्थान है। केन्द्रीय स्वायल सैलिनिटी रिसर्च इंस्टीट्यूट सीएसएसआरआई के एक अध्ययन से पता चला है कि भारत में 6.74 मिलियन हेक्टर जमीन लवणीयता की शिकार है और कृषि रसायनों के प्रयोग से स्थिति और खराब होती है।
लगातार कीटनाशकों के प्रयोग से ‘माइक्रोबियल बायोमास’ घट कर 30-50 प्रतिशत रह जाता है जिससे मृदा की उर्वरता प्रभावित होती है तथा जमीन फसलों को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करने में विफल हो जाती है। ऐसे में आधुनिक कृषि के लिए कीटनाशकों पर कठोर नियंत्रण जरूरी है जिसमें कीटनाशक, फफूंदनाशक या खरपतवार नाशक शामिल हैं।
उनकी विषाक्त प्रकृति के कारण उनके पूरे जीवनचक्र पर ही कठोर नजर रखना बहुत जरूरी हो जाता है जिसमें उत्पादन से लेकर प्रयोग तक शामिल हैं। वर्तमान नियामक ढांचे में सामने आ रहे विषविज्ञान आंकड़ों के आधार पर पंजीकृत कीटनाशकों की समय-समय पर समीक्षा में अक्षमता दिखती है। इस लापरवाही के कारण आम जनता के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा पैदा होता है। यह खासकर ऐसे देश में और गंभीर हो जाता है जहां कीटनाशकों का ठीक से प्रयोग न करना बहुत व्यापक हो गया है। पिछले तीन दशकों में कीटनाशकों के बेलगाम प्रयोग पर नियंत्रण का प्रयास नहीं हुआ है। इनका प्रयोग बढ़ने का कारण अक्सर आक्रामक मार्केटिंग तथा अधिक फसल पैदा करने के लिए कीटनाशकों के अधिकाधिक प्रयोग की रणनीति है।
वर्तमान समय में प्रशिक्षण प्रयास तेज करने की जरूरत है। 1994-95 से 2020-21 के बीच कृषि एवं कृषक कल्याण मंत्रालय के प्लांट प्रोटेक्शन विभाग ने समन्वित कीटनाशक प्रबंधन- आईपीएम में केवल 585,000 किसानों को प्रशिक्षण दिया 150 मिलियन से अधिक किसानों वाले देश में बहुत कम है। कीटनाशक प्रबंधन के अंतरराष्ट्रीय कोड के अनुसार सरकारों तथा उद्योगों को किसानों तथा खुदरा विक्रेताओं को समग्र प्रशिक्षण एवं सूचनाओं से लैस करना चाहिए। इन संस्तुतियों का प्रभावी क्रियान्वयन होना चाहिए। अक्सर किसानों के संपर्क का एकमात्र साधन खुदरा विक्रेता होते हैं जो भ्रामक या आधी- अधूरी सूचनायें देते हैं। डेटा का उपयुक्त संग्रह न करना भी भारत में नियामक व्यवस्था के लिए समस्यायें खड़ी करता है।
राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो- एनसीआरबी दस्तावेजों के अनुसार कीटनाशकों के कारण होने वाली मौतें तभी पंजीकृत होती हैं जब उनको मेडिको लीगल मामलों के रूप में दर्ज किया जाए। इससे कीटनाशकों के गैर- संस्थागत हानिकारक प्रयोग तथा भयानक स्वास्थ्य दुष्प्रभावों के असंख्य मामले दर्ज नहीं हो पाते हैं। इसके कारण नीति निर्माण तथा जवाबदेही में बाधा पैदा होती है। भारत के कीटनाशक नियमन व्यवस्था में समुचित शिकायत निवारण व्यवस्था की कमी सामने आती है। किसानों तथा खेतिहर मजदूरों को कीटनाशकों के दुष्प्रभावों के मामले में न्याय व मुआवजा प्राप्त करने में भरी खर्च करना पड़ता है तथा इसकी प्रक्रिया बहुत जटिल है। इसके अलावा राज्य सरकारें खतरनाक कीटनाशकों पर केवल अस्थाई प्रतिबंध लगा सकती हैं जिसकी अवधि केवल 60 दिन होती है। इससे बहुत बड़ा समुदाय इसके जोखिमों का शिकार बनता रहता है। खेतिहर मजदूरों को कीटनाशकों के दुरुपयोग का ज्यादा जोखिम उठाना पड़ता है, जबकि उनको स्वास्थ्य जोखिम से निपटने के लिए सुरक्षा उपकरणों को खासकर गरम और नम माहौल वाले कृषि क्षेत्रों में जरूरी है। हालांकि, उपभोक्ता संरक्षण कानून सिद्धान्त रूप से किसानों पर भी लागू होता है, पर कीटनाशक निर्माताओं द्वारा भ्रामक लेबिलों या अधोमानक उत्पादों के प्रयोग के खिलाफ कानूनी लड़ाई आसान नहीं है। ऐसे में भारत को एक किसान- केन्द्रित कानूनी ढांचा तैयार करना चाहिए जो अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो क्योंकि यही कृषि को सुरक्षित और टिकाऊ बनाने का एकमात्र रास्ता है। सरकार को खतरनाक कीटनाशकों पर तत्काल प्रतिंध लगा कर किसानों के स्वास्थ्य तथा उपभोक्ताओं की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मानक लागू करने चाहिए।
विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल शैक्षिक स्तंभकार स्ट्रीट कौर चंद एमएचआर मलोट पंजाब

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